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पोप लियो XIV ने AI को “निरस्त्र” करने का आह्वान किया, घातक स्वायत्त हथियारों पर प्रतिबंध लगाने की अपील की

पोप लियो XIV ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता को “निरस्त्र” करने का आह्वान किया और नवंबर में जिनेवा में बैठक करने वाले देशों से घातक स्वायत्त हथियारों पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में ठोस कदम उठाने की अपील की। उन्होंने यह संबोधन 30 अक्टूबर 2026 को पोपों के सभागार में दिया।
इस सभा में “AI का भविष्य: बुद्धिमान प्रौद्योगिकियों के विकास और अनुप्रयोगों पर वेटिकन और वैज्ञानिक जगत के बीच संवाद” में भाग लेने वाले लोग जुटे। इस बैठक का संयुक्त आयोजन पोंटिफिकल एकेडमी फॉर लाइफ और फ्यूचर ऑफ लाइफ इंस्टीट्यूट ने किया था।
कई देशों से आए प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए पोप ने कहा कि उनका मानना है कि वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास को लेकर एक साझा बेचैनी महसूस करते हैं: उन्होंने कहा कि आगे बढ़ने की सही दिशा पहचानी जा चुकी है, फिर भी उस दिशा में आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं हो रहे हैं। उन्होंने प्रतिभागियों की चिंताओं और भविष्य के लिए उनके विचारों व प्रस्तावों के लिए आभार जताया और इन्हें बहुविषयक दृष्टिकोण के शुरुआती नतीजे बताया। उन्होंने कहा कि आज की बड़ी चुनौतियों की जटिलता से निपटने के लिए यह दृष्टिकोण लगातार अधिक आवश्यक होता जा रहा है।
पोप ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर G7 के सत्र में 14 जून 2024 को दिए पोप फ्रांसिस के संबोधन को याद किया। उसमें फ्रांसिस ने AI को ऐसा उपकरण बताया था जो उत्साह और भय, दोनों जगाता है, और कहा था कि किसी मनुष्य का जीवन लेने का निर्णय कभी भी किसी मशीन को नहीं सौंपा जाना चाहिए। लियो XIV ने कहा कि वे शब्द आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उन्होंने आगे कहा कि अपनी धर्मपत्रिका में उन्होंने इन सवालों पर अधिक गहराई से विचार करने का प्रयास किया है, और फिर पाँच विचार रखे।
पाँच विचार
पहला, पोप ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य पहले से तय नहीं है: चूँकि इस प्रौद्योगिकी का विकास मनुष्य करते हैं, इसलिए इसका भविष्य लोगों के चुनावों पर निर्भर करता है। इस कारण, इसके अनुप्रयोगों को दिशा देने और उनमें बदलाव करने की जिम्मेदारी लोगों की है और आवश्यक होने पर उन्हें अस्वीकार करने की भी। उन्होंने कहा कि निर्णायक सवाल यह नहीं है कि AI क्या कर सकता है, बल्कि यह है कि उसे किस उद्देश्य की पूर्ति करनी चाहिए। उन्होंने चेताया कि जो लोग इसके विकास को केवल जीतने की दौड़ मानते हैं, वे लक्ष्य-रेखा पर इतना ध्यान केंद्रित कर सकते हैं कि पीछे छूट गए लोगों को भूल जाएँ। उन्होंने कहा कि ऐसा भरोसेमंद तंत्र, जो मानव व्यक्ति की सेवा करे, उस असाधारण रूप से शक्तिशाली तंत्र से अधिक मूल्यवान है जिसके परिणामों का पर्याप्त रूप से अनुमान लगाना या नियंत्रण करना संभव न हो।
दूसरा, उन्होंने कहा, “मशीनें उपकरण हैं, व्यक्ति नहीं।” AI प्रणालियाँ न तो अनुभव करती हैं, न ही उनका कोई शरीर होता है; वे न खुशी या पीड़ा महसूस करती हैं, न रिश्तों के माध्यम से परिपक्व होती हैं, और न ही भीतर से जानती हैं कि प्रेम, काम, मित्रता या जिम्मेदारी का क्या अर्थ है। कुछ लोग ऐसी प्रणालियों को अधिकार देने, यहाँ तक कि उन्हें कानूनी व्यक्तित्व देने का प्रस्ताव रखते हैं। उन्होंने चेताया कि इस दृष्टिकोण से मानवीय जिम्मेदारी धुँधली पड़ने का खतरा है और नुकसान झेलने वाले लोगों को ऐसे निकाय से न्याय माँगने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है जिसका कोई मानवीय चेहरा नहीं है।
मानवीय निगरानी, साझा हित और संस्थाएँ
तीसरा, पोप ने कहा कि कुछ निर्णय कभी भी दूसरों को नहीं सौंपे जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति का नाम निशाने की सूची में डाले जाने या उसे सीमा-नियंत्रण डेटाबेस में दर्ज किए जाने पर, उसे महज एक डेटा-बिंदु बनाकर रख देने का खतरा होता है। मानव जीवन, स्वतंत्रता और बल-प्रयोग से जुड़े निर्णयों पर हमेशा प्रभावी, सूचित और जिम्मेदार मानवीय निगरानी बनी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इसी कारण कृत्रिम बुद्धिमत्ता को निरस्त्र करना आवश्यक है। उन्होंने नवंबर में जिनेवा में बैठक करने वाले देशों से घातक स्वायत्त हथियारों पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में ठोस कदम उठाने की अपील की।
चौथा, उन्होंने कहा कि बुद्धिमान प्रौद्योगिकियों को साझा हित की दिशा में लगाया जाना चाहिए; उन्हें कभी अपने आप में साध्य नहीं बनना चाहिए और न ही केवल कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के हितों की पूर्ति करनी चाहिए। अपनी धर्मपत्रिका की इस शिक्षा का हवाला देते हुए कि न्याय के लिए नवाचार के लाभों—जिनमें देखभाल, ज्ञान, उपकरण और अवसर शामिल हैं—तक पहुँच आवश्यक है, उन्होंने कहा कि इन प्रौद्योगिकियों के विकास से वैश्विक समुदाय के विभिन्न स्तरों पर एकजुटता और सहभागिता को बढ़ावा मिलना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होना चाहिए कि प्रगति के लाभ समान रूप से साझा किए जाएँ, खासकर उन लोगों के साथ जिन्हें उनकी सबसे अधिक आवश्यकता है।
पाँचवें विचार में उन्होंने संस्थाओं पर ध्यान दिया और इसे शायद सबसे तात्कालिक मुद्दा बताया। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास को दिशा देने वाले कई नैतिक सिद्धांत पहले से ज्ञात हैं; अब ज़रूरत ऐसी संस्थाओं की है जो उन्हें व्यवहार में लागू कर सकें, खासकर प्रभावी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की, जो वैश्विक साझा हितों की रक्षा कर सकें। उन्होंने कहा कि इसके लिए साझा मानक, स्वतंत्र निगरानी और जवाबदेही के स्पष्ट तंत्र आवश्यक हैं, ताकि AI के विकास और उपयोग से जुड़े निर्णयों की जाँच की जा सके, ज़रूरत पड़ने पर उन्हें चुनौती दी जा सके और उनसे हुए नुकसान के लिए उचित उपाय किए जा सकें। पोप ने प्रतिभागियों के योगदान के लिए आभार जताते हुए अपनी बात समाप्त की। उन्होंने उनसे संवाद और साझा हित के प्रति साझा जिम्मेदारी की भावना के साथ प्रयास जारी रखने का आग्रह किया और उन्हें आशीर्वाद दिया।
संबोधन के पीछे की धर्मपत्रिका
इस संबोधन में रखे गए पाँचों विचारों को लियो XIV की 15 मई 2026 को जारी धर्मपत्रिका Magnifica Humanitas के क्रमांकित अंशों में आधार मिला है। इसका पूरा शीर्षक है कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में मानव व्यक्ति की सुरक्षा पर। इस दस्तावेज़ में पोप बताते हैं कि लियो XIII ने 1891 में अपनी धर्मपत्रिका Rerum Novarum प्रकाशित की थी और 2026 में चर्च इस दस्तावेज़ की 135वीं वर्षगाँठ मनाता है।
धर्मपत्र में कहा गया है कि पहले जहाँ राज्य ही बड़े पैमाने पर नवाचार का मार्गदर्शन और दिशा तय करता था, वहीं आज तकनीकी विकास के मुख्य प्रेरक निजी, और अक्सर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार काम करने वाली, ऐसी संस्थाएँ हैं जिनके संसाधन और हस्तक्षेप करने की क्षमता कई सरकारों से अधिक हैं। दस्तावेज़ के अनुसार, इस बदलाव ने तकनीकी शक्ति को अभूतपूर्व और मुख्यतः निजी स्वरूप दे दिया है, जिसके कारण उसे समझना, नियंत्रित करना और जनकल्याण की दिशा में मोड़ना अधिक कठिन हो गया है। इसके अध्यायों में ज़िम्मेदारी, पारदर्शिता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के शासन के साथ-साथ हथियारों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर भी विशेष चर्चा की गई है।












